एक शिक्षक ने अपने छात्र में वह क्षमता देखी, जिसे शायद दुनिया उस समय नहीं देख पा रही थी। आज वही छात्र कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से PhD कर चुके हैं और IIT मद्रास में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
मिलिए प्रोफेसर हेमचंद्रन कराह से। ❤️
चेन्नई के Little Flower School for the Blind से शुरू हुआ उनका सफर आज भारत के प्रतिष्ठित संस्थान IIT मद्रास तक पहुंच चुका है। उनके स्कूल शिक्षक विन्सेंट सर ने उनकी क्षमता पर भरोसा किया और उन्हें सीमित परिस्थितियों से आगे बढ़कर बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया।
यही विश्वास उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण ताकत बना। आज प्रोफेसर कराह IIT मद्रास के Department of Humanities and Social Sciences में Associate Professor हैं। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से PhD करने के बाद उन्होंने अपना काम दिव्यांगता अध्ययन और accessibility जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को समर्पित किया।
वह IIT मद्रास के Accessibility Research Center से जुड़े प्रमुख शोधकर्ताओं में शामिल हैं। उनका उद्देश्य शिक्षा, संग्रहालयों और ज्ञान से जुड़े दूसरे स्थानों को दिव्यांग लोगों के लिए अधिक सुगम और समावेशी बनाना है।
उनके शोध का एक दिलचस्प क्षेत्र Blind Photography भी है। इसमें दृष्टिबाधित लोग सिर्फ कैमरे पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि स्पर्श, आवाज, तकनीक और सहयोग के माध्यम से फोटोग्राफी की रचनात्मक दुनिया से जुड़ते हैं।
प्रोफेसर हेमचंद्रन कराह की कहानी एक गहरा संदेश देती है , समावेशन का मतलब किसी व्यक्ति से कम उम्मीद रखना नहीं है। असली समावेशन का मतलब है उसके रास्ते में खड़ी अनावश्यक बाधाओं को हटाना और उसे अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अवसर देना।
चेन्नई के एक दृष्टिबाधित स्कूल से कैम्ब्रिज और फिर IIT मद्रास तक का उनका सफर साबित करता है कि जब प्रतिभा को अवसर और सही मार्गदर्शन मिलता है, तो कोई भी मंजिल बहुत दूर नहीं होती। ✨
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