9 दिसंबर 2004 को जंगल में मिली एक नवजात बच्ची ने हरे राम पांडेय की जिंदगी बदल दी।
झारखंड के देवघर में रहने वाले 68 वर्षीय हरे राम पांडेय ने उस बच्ची को असहाय हालत में देखा। उसकी स्थिति बेहद गंभीर थी, लेकिन उन्होंने उसे वहीं छोड़ने के बजाय इलाज करवाया और अपनी बेटी की तरह अपनाया। उन्होंने उसका नाम तापसी रखा। शायद उस दिन उन्हें भी नहीं पता था कि यह एक बच्ची उनके जीवन को एक नई दिशा दे देगी।

पत्नी भावनी कुमारी के साथ मिलकर हरे राम पांडेय ने नारायण सेवा आश्रम की शुरुआत की। धीरे-धीरे ट्रेन, जंगल, झाड़ियों और अलग-अलग जगहों पर छोड़ी गई नवजात और बेसहारा बच्चियों को वहां एक घर मिलने लगा। पुलिस और स्थानीय प्रशासन भी ऐसी बच्चियों की जानकारी मिलने पर उन्हें आश्रम तक पहुंचाते रहे।

आज तापसी उन 35 बेटियों में से एक है, जिन्हें हरे राम पांडेय ने अपनाया और पिता का प्यार दिया। आश्रम की बेटियां उन्हें प्यार से बाबा कहकर बुलाती हैं।

सीमित आर्थिक साधनों के बावजूद उन्होंने इन बच्चियों को सिर्फ रहने की जगह नहीं दी, बल्कि उन्हें पढ़ाया, आगे बढ़ने का मौका दिया और बड़े सपने देखने की हिम्मत भी दी। उनकी बेटियों में तापसी और खुशी जैसी बच्चियां डॉक्टर बनने का सपना देख रही हैं।

हरे राम पांडेय का कहना था कि आर्थिक मुश्किलें कितनी भी आएं, वे अपनी आखिरी सांस तक अपनी बेटियों का साथ निभाएंगे।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि पिता बनने के लिए सिर्फ खून का रिश्ता जरूरी नहीं होता। कभी-कभी इंसानियत, जिम्मेदारी और प्यार ही सबसे मजबूत रिश्ता बना देते हैं। ❤️

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